नई दिल्ली, 7 जनवरी 2026: सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण का फायदा उठाने वाले उम्मीदवारों के लिए अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई कैंडिडेट परीक्षा में एससी/एसटी जैसी आरक्षित श्रेणी की छूट लेता है, तो वह अनारक्षित (जनरल) सीट पर नियुक्ति का दावा नहीं कर सकता। यह निर्णय 2013 की भारतीय वन सेवा (IFS) परीक्षा से जुड़े मामले में आया।
पूरा मामला क्या था
2013 IFS परीक्षा के प्रारंभिक चरण में जनरल कैटेगरी का कट-ऑफ 267 अंक था, जबकि एससी के लिए 233 अंक। एससी कैंडिडेट जी. किरण ने 247.18 अंक लाकर छूट का लाभ उठाया और पास हुए। जनरल कैंडिडेट एंटनी एस. मारियप्पा ने 270.68 अंक प्राप्त किए। मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू के बाद फाइनल मेरिट में किरण 19वें और एंटनी 37वें स्थान पर रहे।
कर्नाटक कैडर में जनरल इनसाइडर सीट केवल एक थी, जो एंटनी को मिली, जबकि किरण को तमिलनाडु कैडर आवंटित हुआ। किरण ने CAT और कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दी, जहां दोनों ने उनके पक्ष में फैसला दिया। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलटा फैसला
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और विजय बिश्नोई की बेंच ने कर्नाटक हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने IFS नियम 14(ii) का हवाला देते हुए कहा कि आरक्षित श्रेणी का उम्मीदवार तभी अनारक्षित सीट के लिए विचारणीय है, यदि उसने किसी भी चरण में छूट न ली हो। किरण ने प्रीलिम्स में छूट ली, इसलिए जनरल सीट का हक नहीं बनता।
जस्टिस माहेश्वरी ने फैसले में लिखा कि प्रीलिम्स छूट को बाद के चरणों में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम साजिब रॉय मामले का उल्लेख किया, जहां भी यही सिद्धांत लागू हुआ था। यह फैसला आरक्षण नीति की स्पष्टता लाता है और भविष्य के मामलों में मार्गदर्शन देगा।

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